Tuesday, April 26, 2016

Denial of OROP to Reservists etc. : Tribunal issues notice to MoD

Chandigarh, April 18

The Armed Forces Tribunal, Chandigarh Bench, has issued notice to the Ministry of Defence on a petition challenging the notification issued by the Ministry regarding the one rank one pension (OROP) on February 3, 2016.
The petitioners contend that para 4.1 of the notification deprives reservist pensioners /DSC Pensioners and those who are in receipt of two pension and many other categories from the benefits of one rank, one pension from July 1, 2014, which is illegal, discriminatory, arbitrary, resulting in violation of the Articles 14 and 16 of the Constitution and infringement to the Right to Property .
The Bench of the AFT consisting of Justice Parkash Krishna and Lt Gen DS Sidhu ( Retd) issued notice for July 4, 2016, to the Ministry of Defence.
The petitions were filed by the chairman of the All-India Ex-servicemen Welfare Association, Bhim Sen Sehgal, on behalf of the petitioners Baldev Singh, Raghuvir Singh, Bhuri Singh, Raj Mal, Chand Kishore Sharma and many others reservist pensioners, DSC pensioners, as well as those drawing two pensions but deprived of the one rank one pension from July7, 2014.
The association has demanded setting aside of the portion of the notification and direction to the authorities for the grant of OROP to all categories of personnel, including the reservist pensioners, DSC pensioners and those drawing two pensions and the pensions of all these categories be revised from July 1, 2009, September 24, 2012 and then from July 1, 2014, onwards and all arrears be paid to them with interest and exemplary damages.
Sehgal, who appeared for the (PBORs) submitted before the Bench that these reservist pensioners of the Indian Army had served during emergencies of the Indo-China Aggression of 1962, Indo-Pak War of 1965 and 1971 and on completion of their regular and reserve service of 15 years were granted the reservist pension of Rs 40 pm in 1972 which was revised to Rs. 375 pm from January 1,1986, then Rs1,275 pm from January 1,1996 and then Rs 3,500 pm w.e.f January 1, 2006, but thereafter there was no increase in their pension from July, 2009, September 24, 2012, and then from July 1, 2014 (on OROP). The association had already submitted representation to the authorities concerned but nothing has been done till date, hence the association moves the Armed Forces Tribunal for the relief to these unfortunate soldiers who are in advance stage of their life.

(Source- The Tribune)
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वन रैंक वन पेंशन का लाभ नहीं मिला, ट्रिब्यूनल में दी चुनौती


रक्षा मंत्रालय की वन रैंक वन पेंशन योजना को चंडीगढ़ आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल (एएफटी) में चुनौती दी गई है। सोमवार को वन रैंक वन पेंशन (ओआरओपी) के खिलाफ कुल आठ याचिकाएं दायर हुईं। ट्रिब्यूनल के जस्टिस प्रकाश कृष्णा व लेफ्टिनेंट जनरल डीएस सिद्धू की बेंच ने रक्षा मंत्रालय को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

इस मामले की सुनवाई अब चार जुलाई को होगी। केंद्र सरकार की ओर से नोटिफिकेशन जारी होने के बाद यह पहली बार है, जब किसी ट्रिब्यूनल में वन रैंक वन पेंशन को चुनौती दी गई हो।

एएफटी में ओआरओपी को चुनौती देने वाले आल इंडिया एक्स सर्विसमैन वेलफेयर एसोसिएशन के चेयरमैन भीमसेन सहगल ने बताया कि नोटिफिकेशन के पैरा नंबर 4.1 में उल्लेख है कि इस योजना का लाभ रिजर्व फोर्स के सिपाहियों को नहीं मिलेगा। उन्हें जो भी पेंशन मिल रही है, उसमें कोई इजाफा नहीं होगा।


उन्होंने बताया यह फैसला अन्यायपूर्ण है। यह उन सिपाहियों के साथ धोखा है, जो साल 1962, 1965 और 1971 के युद्ध में देश के साथ खड़े हुए और दुश्मनों को मुंह तोड़ जवाब दिया। रेग्युलर और रिजर्व सर्विस पूरी होने के बाद उन्हें पेंशन मिलने लगी। उन्हें अभी इतनी कम पेंशन मिल रही है, जिससे घर का खर्चा चलाना उनके लिए मुश्किल हो गया है।

सिर्फ 3500 रुपये मिल रही पेंशन
सहगल के मुताबिक फौज में पहले आठ साल रेग्युलर जॉब करनी पड़ती थी। उसके बाद उन्हें रिजर्व फोर्स में सात साल के लिए रखा जाता था। रिजर्व फोर्स में जाने के दौरान उन्हें हर महीने सिर्फ 20 रुपये मिलते थे। हालांकि दो महीने के लिए उन्हें ट्रेनिंग में भेजा जाता था, जिसमें उन्हें मेहनताना मिलता था। पूरे उत्तर भारत में इस कैटेगरी के गिनती के ही सिपाही बचे हैं। 1972 में उनकी पेंशन 40 रुपये थी। 1986 में रिवाइज कर 375 रुपये कर दी गई। 1996 में 1275 और फिर 2006 में 3500 रुपये, लेकिन इसके बाद कोई इजाफा नहीं किया गया, जबकि 2009, 2012 और 2014 में बाकियों की पेंशन में बढ़ोतरी हुई, लेकिन इनका एक भी रुपया नहीं बढ़ा।

कई बार पत्र लिखा, लेकिन नहीं हुई सुनवाई
एसोसिएशन ने इस बारे में संबंधित अथॉरिटीज को कई बार पत्र लिखा, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। आखिर में उन्हें ट्रिब्यूनल में जाना पड़ा। उन्होंने बताया कि वन रैंक वन पेंशन के मुताबिक उन्हें अब 6665 रुपये पेंशन मिलनी चाहिए, लेकिन उन्हें सिर्फ 3500 रुपये में ही गुजारा करना पड़ रहा है। इन पेंशनरों की उम्र 80-90 साल होगी। उम्र के इस पड़ाव में उन्हें काफी दिक्कतें झेलनी पड़ रही हैं। इतनी कम राशि में उन्हें घर चलाना मुश्किल हो रहा है। याचिका दायर करने वालों में बलदेव सिंह, रघुवीर सिंह, भूरी सिंह, राज मल व चंदकिशोर सहित कई लोग शामिल हैं।

(Source- Amar Ujala )

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